शनिवार, 31 दिसंबर 2011 by Michaelets Hindi Voice in


freedom fighters
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ja na ga na mana
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vanda matharam
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परीक्षा ध्यान दे
बुधवार, 7 दिसंबर 2011 by raghuram.p.a. in लेबल:

दसवीं मे डायरी कैसे लिखे ?
दिन दिनांक अवश्य लिखे ल
आशय संक्षिप्त हो
आत्मानिष्ठ शैली चाहिए

थक चुकी हे वह
मंगलवार, 6 दिसंबर 2011 by Michaelets Hindi Voice in लेबल:

थक चुकी है वह

इतनी थक चुकी है वह
प्यार उसके बस का नहीं रहा
पैंतीस बरस के
उसके शरीर की तरह
जो पैंतीस बरस-सा नहीं रहा
घर के अंदर
रोज़ सुबह से वह
लड़ती-झगड़ती है बाज़ार से
और बाज़ार में रोज़ शाम
घर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते खो जाती है।
रोटी बेलते वक्त अक्सर वह
बटन टाँक रही होती है
और कपड़े फींचते वक्त
सुखा रही होती है धूप में
अधपके बाल।
फिरकी-सी फिरती रहती है
पगलायी वह
बच्चों को डाँटती-फटकारती
और बिना बच्चों के सूने घर में
बेहद घबरा जाती है।
कितना थक चुकी है वह
मैं उसे एक दिन
घुमाने ले जाना चाहता हूँ
बाहर
दूर...
घर से बाज़ार से
खाने से कपड़ों से
उसकी असमय उम्र से।

रविवार, 4 दिसंबर 2011 by Michaelets Hindi Voice in लेबल:



जन्म : 13 सितम्बर 1939, जिलाटीकमगढ़, मध्यप्रदेश।
शिक्षा : एम.. बी.एड।
1983
से 1994 तक हिन्दी के रीडर पद पर कार्य के बाद दो वर्ष तकमध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमीके संचालक। 1998 से 2001 तक क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भोपाल में हिन्दी के प्रोफेसर तथा समाज विज्ञान और मानिविकी शिक्षा विभाग के अध्यक्ष। साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश परिषद् के निदेशक रहे एवं मासिक पत्रिकासाक्षात्कारका संपादन किया।
प्रकाशित कृतियाँ : कविता संग्रहसमुद्र के बारे में(1977), दी हुई दुनिया(1981), हुआ कुछ इस तरह(1988), सुनो हिरामन(1992), सच पूछो तो(1996), बिथ-कथा(1997), हमने उनके घर देखे(2001), ऐसी कैसी नींद(2004), निर्वाचित कविताएं(2004) आलोचनाकविता का दूसरा पाठ(1993) मराठी, बंगला, उडि़या, कन्नड़, मलयालम, अंग्रेजी तथा जर्मन भाषाओं में कविताएं अनूदित।
सम्मान : दुष्यंत कुमार पुरस्कार(1979), वागीश्वरी पुरस्कार(1989), शिखर सम्मान(1997–98)
सम्पर्क : 129, आराधना नगर, भोपाल–462 003
फोन : 0755–2773945

वह कुछ हो जाना चाहता है
by Michaelets Hindi Voice in लेबल:

वह कुछ हो जाना चाहता है

तमाम उम्र से आसपास खड़े हुए
लोगों के बीच
वह एक बड़ी कुर्सी हो जाना चाहता है
अन्दर ही अन्दर
पल-पल
घंटी की तरह बजना चाहता है
फोन की तरह घनघनाना चाहता है
सामने खड़े आदमी को
उसके नंबर की मार्फ़त
पहचानना चाहता है
वह हर झुकी आँख में
दस्तख़्त हो जाना चाहता है
हर लिखे काग़ज़ पर
पेपरवेट की तरह बैठ जाना चाहता है
वह कुछ हो जाना चाहता है।