नदी और साबुन कविता 2.
गुरुवार, 17 नवंबर 2011 by raghuram.p.a. in

एक नीली साबुन _बट्टी
वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का
बहुप्रचारित साबुन है
दुखियारी महतारी गंगा
उसका जी डरता है भय से
उसकी प्रतिद्वंद्वी हथेली _ भर की वह
जो साबुन की टिकिया है
इजारेदार पूंजीवाद की बिटिया है
उसका महाबली झाग उठने से पहले
गंगा के दिल मे हौल उठता है
ज्ञानेद्रपति

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