चट्टानें
रविवार, 4 दिसंबर 2011 by Michaelets Hindi Voice in लेबल:

चट्टानें

चारों ओर फैली हुईं
स्थिर और कठोर चट्टानों की दुनिया के बीच
एक आदमी
झाड़ियों के सूखे डंठल बटोर कर
आग जलाता है।

चट्टानों के चेहरे तमतमा जाते हैं
आदमी उन सबसे बेख़बर
टटोलता हुआ अपने आपको
उठता है और उनमें किसी एक पर बैठकर
अपनी दुनिया के लिए
आटा गूँधता है।

आग तेज़ होती है
चट्टानें पहली बार अपने सामने
कुछ बनता हुआ देखती हैं ।

अंत में आदमी
उठकर चल देता है अचानक
उसी तरह बेख़बर
चट्टानें पहली बार अपने बीच से
कुछ गुजरता हुआ
महसूस करती हैं।



चिड़ियों को पता नहीं
by Michaelets Hindi Voice in लेबल:




वाटिका
समकालीन कविता के उपवन का मासिक भ्रमण
बृहस्पतिवार, ३१ जुलाई २००८
दस कविताएं– भगवत रावत

चिड़ियों को पता नहींचिड़ियों को पता नहीं कि वे
कितनी तेज़ी से प्रवेश कर रही हैं
कविताओं में।
इन अपने दिनों में खासकर
उन्हें चहचहाना था
उड़ानें भरनी थीं
और घंटों गरदन में चोंच डाले
गुमसुम बैठकर
अपने अंडे सेने थे।
मैं देखता हूँ कि वे
अक्सर आती हैं
बेदर डरी हुईं
पंख फड़फड़ाती
आहत
या अक्सर मरी हुईं।
उन्हें नहीं पता था कि
कविताओं तक आते-आते
वे चिड़ियाँ नहीं रह जातीं
वे नहीं जानतीं कि उनके भरोसे
कितना कुछ हो पा रहा है
और उनके रहते हुए
कितना कुछ ठहरा हुआ है।
अभी जब वे अचानक उड़ेंगी
तो आसमान उतना नहीं रह जाएगा
और जब वे उतरेंगी
तो पेड़ हवा हो जाएंगे।
मैं सारी चिड़ियों को इकट्ठा करके
उनकी ही बोली में कहना चाहता हूँ
कि यह बहुत अच्छा है
कि तुम्हें कुछ नहीं पता।
तुम हमेशा की तरह
कविताओं की परवाह किए बिना उड़ो
चहचहाओ
और बेखटके
आलमारी में रखी किताबों के ऊपर
घोंसले बनाकर
अपने अंडे सेओ।
न सही कविता में
पर हर रोज़
पेड़ से उतरकर
घर में
दो-चार बार
ज़रूर आओ-जाओ।

नदी और साबुन कविता 2.
गुरुवार, 17 नवंबर 2011 by raghuram.p.a. in

एक नीली साबुन _बट्टी
वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का
बहुप्रचारित साबुन है
दुखियारी महतारी गंगा
उसका जी डरता है भय से
उसकी प्रतिद्वंद्वी हथेली _ भर की वह
जो साबुन की टिकिया है
इजारेदार पूंजीवाद की बिटिया है
उसका महाबली झाग उठने से पहले
गंगा के दिल मे हौल उठता है
ज्ञानेद्रपति